†लोकाचरण से सूत्र†
•{लोकाचरण-खण्ड}- अध्याय -चतुर्थ -• लोक- आचरण के सूत्र•★ १- समाजिकस्य विसङ्गतयः सन्ति त्रुतायः। दोषाश्च मनुष्याणां विस्मरणम्। शताब्दशः त्रुटयः त्रुटयः च प्रचलन्ति उभयोः स्तरः वेगः च भिन्नः अस्ति । _________ सामाजिक विसङ्गतियाँ: ग़लतियाँ हैं । और भूल हैं मनुष्यों की विस्मृतियाँ । भूल और गलती चलती सदियों से दौनों के स्तर अलग- अलग हैं गतियाँ।। २- हमको बहुत समझा औरों ने दिल में बहुत कुछ और था । हमको अपना बहुत समझा गैरों ने जिन पर हमारा नहीं कभी गौर था ३- हर कर्म की प्रेरक मेरी ये हालात है ! सहायक प्रवृत्ति या परिवेश ये ' संस्कार तो दूसरी बात है । ४- मुझे हर तरफ मोड़ा उन हालातों ने मेरे रुहानी जज्बातों ने या विरोधीयों की बातों ने । -अन्ये अस्मान् बहु अवगच्छन् मम हृदये बहु किमपि आसीत् । अपरिचिताः अस्मान् स्वकीयान् मन्यन्ते स्म यस्मिन् वयं कदापि ध्यानं न दत्तवन्तः ३-मम एषा स्थितिः प्रत्येकस्य कर्मस्य प्रेरणा भव...